Fashion – the changing Notion

In this era of technological evolution, the notion of fashion has changed. With a constant updates from social media – information is just a click away. I ever wonder how this changing pattern can make an impact on fashion which has been evolved through ages.

The word Fashion – when I learned, being born and brought up in western parts of our country, from me it was all about Bollywood – the swag carried by celebrities, their show-up of larger than life size in films and media, the cult figures creating ripples among the nation, and the high-profile unaffordable fashion brands beyond the reach of any middle-class.

The world of glamour, glittering in the eyes of fashion freaks creating fantasies of unimaginable royal & luxurious lifestyles, every now and then, add some fresh glam into the mix – kind of quirky, chic, bohemian, contemporary, traditional or any thematic swag into the look.

I woUntitled-1.jpgnder how the fashion evolved. What was fashion then and what is fashion now? From towering wigs to plunging necklines, cinched corsets to padded shoulders, fashion has always been a colorful reflection of any culture.

In general the word the fashion can refer to any popular trend – be it clothing, footwear, makeup, hairstyles, jewelry and any other style at any particular place and time.

If I go through resources, early fashion was simple and functional fulfilling the basic need of protection. It was designed for the protection from elements of nature. Crude sandals shielded people’s feet from rough ground. Furs and animal skins were used for the warmth more than beauty. But even the prehistoric communities embellished their skin with decorative ornamentation like shell, bones, tattoos or any other decorative source.

The notion evolved with the touch of sophistication with varied cuts and colors indication person’s gender, religion, occupation or any social stature. Later, fashion became the integral part of any culture with the complex structure creating a beautiful art form.Untitled-2.jpg

With the growth of technology, also comes the wearable technology. Our experience of wearable up until now has been trying out a fitness trackers and smart watches. Staying connected with the globe, accuracy of data and work efficiency are all becoming easier to operate and facilitating our lifestyles.

Untitled-3.jpgWith smart lifestyle also comes the exploitation of Natural resources. Nothing can replace our Mother Earth; our source of energy and life ‘within’. With the consistent journey of growth traveled from need to luxury in Fashion, another need arise to sustain the natural resources which created another trend of sustainable fashion. Designers now working with varied sustainable strategies to sustain the resources of nature. Recent innovations and trends towards sustainable consumption brought the integral opportunities in the field of fashion.

Today’s era of innovation and technology has brought complexity and dynamism in the fashion sector, where the aesthetic factors, style and image are of fundamental importance to emphasize the evolved fashion. Who knows, what lies in tomorrow’s package. For today, it is a way of living of every person on earth.

 

लोकतांत्रिक ‘खतरा’ या कोरी ‘अफवाह’

भारत विश्व का एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है जिसकी बुनियाद चार स्तम्भों पर टिकी हुई है। जिन्हें हम कार्यपालिका, विधानपालिका, न्यायपालिक और मीडिया के रूप में जानते है। यहीं लोकतंत्र हमारी अभिव्यक्ति की आजादी और हमारे अधिकारों का संरक्षण भी करता है लेकिन आजकल लोकतंत्र की साख को खतरा है ऐसी बातें करना आम हो गया है, कुछ बुद्धिजीवी वर्ग भी इसकी अपने हिसाब से परिभाषा गढ़ने में लगे रहते है। पिछले कुछ घटनाक्रमों के बाद तो देश की सर्वोच्च अदालत के कुछ न्यायाधीश  भी इस दौड़ में शामिल हो गए है। जो सरासर न्यापालिका की साख पर सवालिया निशान लगाता है। जेएनयू कैंपस में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश विरोधी नारे लगाना, चुनाव से पहले गुजरात में जातीय हिंसा आदि ऐसे उदाहरण मौजूद है जो लोकतंत्र की मौजूदगी को दागदार करते हैं। दरअसल लोग समस्या की जड़ में ना जाकर बस लोकतंत्र खतरें में है इसकी दुहाई देते रहते हैं। इस तरह की समस्याओं का कारण चाहे कोई भी हो लेकिन सभी का तर्क यहीं होता है कि लोकतंत्र खतरे में है, देश को बुरी ताकतों से बचाना है।

गौरतलब है कि कोई कभी यह नहीं सोचता कि कर्ज में डूबा किसान अपनी जीवन लीला समाप्त करने से भी गुरेज नहीं करता और वहीं दूसरी तरफ देश का बड़ा तबका हर रोज भूखे पेट सोने को आज भी मजबूर है। इन सब से किसी को भी लोकतांत्रिक खतरा नज़र नहीं आता। यहां तक कि देश का शासन-प्रशासन भी अपनी आंखे मूंद कर बैठ जाता है। आलम तो ऐसा है कि ऐसी घटनाएं सामने आने पर शासन- प्रशासन मदद करने की बजाय मामले को दबाने का भरसक प्रयास करता है। इस देश का दुर्भाग्य यहीं है कि कितनी सरकारें आई और गई लेकिन किसी ने भी इन समस्याओं को जड़ से समाप्त नहीं करने की बजाय हल्का-फुल्का मरहम लगाने का ही काम किया है। यहां सवाल उठता है कि लोकतंत्र को खतरा बताने वाले या अभिव्यक्ति की आजादी के हनन होने का रोना रोने वाले इन मुद्दों पर किसी बिल में घुस जाते है।

लोकतंत्र को अगर हम विभाजित करें तो लोक+तंत्र बनता है और लोक मतलब आम जन होता है वहीं तंत्र मतलब देश को चलाने वाली मशीनरी, लेकिन यहां पर लोक की जान जाने पर तंत्र को जरा भी फर्क नहीं पड़ता है। फर्क पड़े भी तो क्यों? सच्चाई तो यह है कि आमजन द्वारा चुने हुए हमारे जनप्रतिनिधियों को आम लोगों की वास्तविक स्थिति का सही अंदाजा ही नहीं है। हर राजनीतिक पार्टी सिर्फ एक- दूसरे को कोसती रहती है। देश ऐसी दुखद घटनाओं से अभिशप्त हो गया है वहीं जनता के नुमाइंदे उनकी गरीबी का मजाक उड़ाने से भी पीछे नहीं हटते है। एक आंकड़े के मुताबिक, सांसदों की सैलरी और अतिरिक्त भतों को मिला दिया जाए तो संख्या लाखों में पहुंच जाती है। जिसमें उन्हें हर तरह की सुख सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं जिसमें यात्रा के सभी मार्गों( हवाई, सडक और रेल मार्ग) से आने जाने की सुविधा भी शामिल है। इसी तरह टेलीफोन, बिजली-पानी, स्वास्थ्य संबंधी इत्यादि सुविधा भी अलग से दी जाती है। ऐसे में सोचनीय यह है कि मुफ्त में जीवन जीने वाले लोग कैसे गरीब और गरीबी की मार को समझ सकते है। दरअसल देश में लोकतंत्र को खतरा बताने वालों को इन सब मुद्दों को लेकर भी  आवाज उठानी चाहिए। सभी निजी हितों के लिए लोकतंत्र को खतरा बताने वालों को अपने निजी मसलों का हल संवैधानिक तरीके से करना चाहिए। इसमें लोकतंत्र को घसीटना किसी भी तरह न्यायोचित नहीं होता है। लोकतंत्र के साथ न्याय तभी होगा जब हम देश की मूलभूत समस्याओं पर ध्यान देगें।

ROTOSCOPY: A REVOLUTIONARY TECHNIQUE FOR VFX ARTIST

Introduction

Rotoscoping is a very important technique in the visual effects production pipeline. In traditional Animation rotoscoping is a process to trace over the real live shoot frame by frame and these techniques mostly used in animated films to get the realistic movements of the subject in the shot. In visual effect the process is similar but in a different form, it is used to create a roto shape or mask for an object /subject to extract it from the background.

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Rotoscoping artist has to trace an object within the software with given tool to create the alpha channel.The artist needs to create different roto shape for an object and animate those shapes according to the movement.

History of Rotoscopy

Rotoscopy word came from word rotoscope. Rotoscope was a device invented by Max Fleischer in 1917 it changes the face of the Animation industry.

In the very early stage, the animated films were very jerky  so Max Fleischer decided to change this animation style introducing a device, using that device an artist could place a paper peace on the animation stand and trace live-action footage frame by frame. This device is known as ‘Rotoscope’ and patented in 1917 by Fleisher.

Process

In the rotoscopy process, the artist has to trace an object out to remove it from the scene or to apply effects exclusively within the created matte or mask. Rotoscoping is work similarly as a clipping path. Due to the fluid motion of live-action frames, rotoscope technology brought the illusion of even greater fluidity with the animation. Today, Rotoscoping process refers to manually creating a matte for a visual element on a live-action plate in order to composite it onto another background for use in film or a movie.

Role of Rotoscopy artist

Digital rotoscope artist’s job is to create extremely detailed digital mattes using 2D image processing software and drawing tools. These matters are used for wire removals, rig removals, background fixes, and blue screen removals. These days the career in VFX AS rotoscopy artist is perspective for the young professionals who are willing to join VFX field.

सिनेमा: मनोरंजन बनाम फूह़डता

आज समय की रफ्तार को तो जैसे पंख लग गए है, वक्त के साथ हर चीज का व्यवसायीकरण होता जा रहा है। हर कोई अपनी तिजौरियों को भरने में लगा हुआ है, सामाजिक, नैतिक मूल्यों की तो जैसे किसी को परवाह ही नहीं है। पूंजीवाद के इस कड़वे सच की कल्पना शायद हमारे पूर्वजों ने कभी नहीं की थी। समय के साथ सिनेमा के क्षेत्र में आए गम्भीर बदलाव दर्शाते है कि पूंजीवाद कैसे हमारे नैतिक मूल्यों पर हावी हो गया है। मनोरंजन को पहले मानव जीवन में नीरसता को दूर करने के साधन के रूप में समझा जाता था परंतु आज इसका अर्थ बेमानी हो गया है। मेरी स्मरण शक्ति पर जोर देने से याद आता है कि बचपन में कैसे हम बिना रंगीन तस्वीर के बॉक्सनुमा डिब्बे को देखने के लिए जद्दोजहद करते थे, छत पर लगे 2-4 इंच के एंटीना से धुंधली तस्वीर को दूर करने के लिए आए दिन कसरत करते थे। लेकिन विज्ञान के चमत्कारों के सामने खास चीजें आम हो गई है, आए दिन होने वाले आविष्कारों के सामने हर चीज बौनी नज़र आती है। इस प्रगति ने दुनिया को छोटा कर दिया है साथ ही टीवी की पहुंच आमजन तक लाने का श्रेय भी वैज्ञानिक तकनीक को जाता है। किसी भी देश के लिए तकनीकी विकास स्वागत योग्य है लेकिन इस प्रगति से अगर सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्यों का हास कतई तारीफ योग्य नहीं हो सकता।

आज के दौर में मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता हर घर में परोसी जा रही है जो कि किसी भी देश के सामाजिक सरोकार के लिए उचित नहीं हो सकता। हम सब ने ऐसा दौर भी देखा है जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर रामायण, महाभारत जैसे पौराणिक कथाओं के जीवंत रूप को टीवी पर देखकर आन्नदित होते थे। इस तरह के धारावाहिकों को देखने के लिए पूरी गली, मौहल्ले में सन्नाटा पसर जाता था, वहीं आज का दौर है जहां सिर्फ मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता को परोसा जाता है। आज कोई भी व्यक्ति सपरिवार टीवी नहीं देख सकता, अगर गलती से पूरा परिवार एक साथ बैठकर देखने लग भी गया तो अश्लीलता की परकाष्ठा ऐसी है कि एक दूसरे की बगले झांकने लगते है।

दरअसल देश में विकास के जरिए आने वाले बदलाव का दुष्प्रभाव सिनेमा के क्षेत्र पर भी पडा है, जिसके परिणामस्वरूप हम ताजा उदाहरण ‘वीरे दी वेंडिग’ जैसी फिल्मों में देख सकते है जिसमें फूह़डता को परोसा गया है। ऐसे बहुत सी फिल्में, धारावाहिक इत्यादि भी है जो सामाजिक नैतिकता मूल्यों के स्तर को गिराते जा रहे है। इस तरह सिने-सिनेमा जगत में मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता दिखाने से युवा पीढ़ी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है क्योंकि युवा हमेशा फिल्मों और उनके किरदारों से प्रेरित होकर उनकी नकल करने की कोशिश करते है। हमारे सामने ऐसे कई फिल्मों के उदाहरण है जिनके कारण युवाओं की मानसिकता पर गलत प्रभाव पड़ा है।

विश्व में हमारे देश को सांस्कृतिक मूल्यों की धरोहर के रूप में जाना जाता है ऐसे में इस तरह की फूह़डता कहां तक वाजिब है यह भी सोचनीय विषय है। हमारे समाज में संस्कारों और संस्कृति पर ही पूरा पारिवारिक प्रथा टिकी हुई है अगर हम भी पाश्चिमी संस्कृति से अभिभूत हो जाएंगे तो समाज में असंतोष फैल जाएगा। आजकल हर टीवी चैनल टीआरपी के चक्कर में अश्लीलता को परोस रहा है चाहे उसका माध्यम कोई भी हो जैसे- प्रिंट मीडिया, इलैक्ट्रानिक मीडिया, न्यू मीडिया। आज फिल्मों ने तो नग्नता की सारी हदें पार कर दी है, नायक-नायिका के बीच निजी पलों को बड़ी ही खुले तौर पर दिखाया जाता है। आज सिनेमा क्षेत्र में जरूरत है कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर कार्यक्रम बनाए जाए, ताकि मनोरंजन के साथ-साथ समाज में सकारात्मक प्रभाव भी पड़े। आज लोगों को आदर्श उदाहरणों की जरुरत है ना कि ऐसे कार्यक्रम जो हमारी मानसिकता को दूषित करें।

Why to Study Textiles?

Food, Clothing and Shelter are considered indispensable part of human life. A person cannot coexist in society if there is shortage of these three things. Human have been adorning cloths from prehistoric times. Clothing has always been linked with modesty, beauty, safety and status. But usage of clothing has changed according to its characteristics. How the characteristics of clothes worn are defined? Well the answer lies in study of Textiles.

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For a beginner term Textile may astonish you? Well, the word textile comes from latin word ‘texere’ meaning to weave, originally applied to woven fabrics but now also applied to natural and synthetic filaments, yarns and threads as well as to woven, knitted, felted, braided, bonded, knotted and embroidered fabric made from them.

Therefore textile is a vast industry to look upon. A lot of manpower is involved in textile production. India stands second in providing employment in this sector.

For fashion design students it is must to study Textile as a subject due to following reasons:

  1. Study of textiles will explain students why certain fabric performs differently. For e.g. Wool provides warmth, cotton coolness, polyester has static charge etc.
  2. Student well verse in this subject has ability to appreciate various variations of similar type fabrics. E.g. Cotton fabric has various variations available in market like: Poplin, Muslin, Mulmul, Chambray, Egyptian cotton, Jersey etc.
  3. Textiles study will help to enlighten students about: how to buy, what to buy for their collections.
  4. Textile study will also enable students to appreciate cultural association of a textile to a region. Eg – Chanderi sari, Patola Sari etc.
  5. Also it will give deep information into various employment avenues present for them.

Textile is fun learning that broadens your horizon for designing in the process of becoming a Fashion Designer.

Few of the famous textile artists are:

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The Last Dance of the Leaves – Elements of Nature

Art is an expression. What could define the expression in visual art better than Artist Sunder Ramu? The recent exhibition held in Mumbai displayed the beautiful expressions of The Last Dance of the Leaves, revealing the message that the leaves never fell flat when they came off the trees, they always danced, and their colours were so beautiful; celebrating life so beautifully.

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Recently I read an article in Vogue.in regarding the exhibition held in Mumbai. We all grew up in/with nature – there are lakes, animals, birds, waterfalls, quiet beautiful and very soothing. If we take small amount of break in our daily urban life, and try and observe the beautiful nature around us, we can see the dance; the tranquility, the pure aura; the meditation – it’s all and always pleasant to the eyes and soul. The journey of our soul is so busy in urban jungle that we tend to forget to notice the tiny beauties of nature surrounding in our immediate existence.

The artist Mr. Sunder Ramu, felt the abundant positivity and the zeal of life – he claims how human ability to find hope in the simplest things in nature can turn into life around, even in our darkest hours. The dead leaves he observed in nature made him think that life and love need not be everlasting, and people attach too much with an idea of “forever”. And if humans thinks themselves as leaves, the dance that humans have, between falling from the branch to the earth, is all that a person needs.

Nature.jpgSo, what say, Pals? Are you feeling low? Are you in the dark? Don’t you find any hope in Life? Take a break and have a closer look in the nature around. There is always a sense of healing in nature. Go to nearby beach, listen to the sound of waves and let the rhythm of water set your soul free; go to some lake and feel the calmness and have some peace there, for peace comes in calmness;  go in some forest and feel the music of birds chirping, the trees ahead and the bushes behind, the forest knows there you are and listen to the gentle breathes of forest; go nearby the river and feel the never ending flow of water, sometimes calm, sometimes fierce, flowing from source into the sea.

B.Sc. in Fashion Designing

 

पत्रकारिता का बदलता स्वरुप

भारत देश में पत्रकार को समाज का आईना समझा जाता है वहीं मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है। भारत में विविधताओं का समावेश है जिसके कारण पत्रकार का आमजन तक पहुंच पाना कहीं ना कहीं बड़ी चुनौती समझा जाता है। दरअसल आजादी से पहले पत्रकारिता को आजादी के हथियार के तौर पर प्रयोग किया जाता था जो कि आज के दौर में विंसगत हो गया है। जिस तेजी गति से समय बदला है उसी तेजी से पत्रकारिता का अपना स्वरुप बदलता जा रहा है।

आजकल पत्रकारिता में तकनीकी चुनौतियां भी मुहं खोले खड़ी है वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे उदाहरण भी हमारे सामने है जो पत्रकार की सुरक्षा पर भी सवालिया निशान लगा देते है। ताजा उदाहरण में तौर पर राम रहीम केस को लिया जा सकता है पत्रकार बिरादरी पंचकूला की घटना को कैसे भूल सकते है, अदालत के फैसले पर बाबा के अंधभक्तों ने कैसे हिंसक हो गए थे और मीडिया को अपने गुस्से का शिकार बना लिया था। वहीं यह भी देखने को मिलता है कि आधुनिकता के दौर में पत्रकारिता अपने मूल लक्ष्य को छोड़कर व्यवसायीकरण की तरफ जाती दिख रही है। वहीं कभी- कभी कुछ सरकारे भी पत्रकार की कलम पर पांबदी लगाने की कोशिश करती है जो पत्रकार की आजादी पर चोट है।

गौरतलब है कि संविधान में पत्रकार को अलग से किसी भी तरह की आजादी का प्रावधान नहीं है, पत्रकारों को भी आम जनता जैसे अधिकार मिल हुए है लेकिन समाज हमेशा पत्रकार को सही मार्गदर्शक के तौर पर देखता है, क्योंकि उसकी लेखनी की ताकत का कोई सानी नहीं है। ऐसे में पत्रकार की जिम्मेदारी बहुत ही ज्यादा संवेदनशील बन जाती है। यहां पर इस बात पर भी प्रकाश डालना अहम हो जाता है कि युवा पत्रकार को डिजिटल तकनीक के हिसाब से खुद को बदलना होगा परन्तु पत्रकारिता के मूल्यों, नीति को हास होने से भी बचाना होगा तब जाकर कहीं पत्रकार अपने क्षेत्र से न्याय कर पाएगा।

आजकल पत्रकारों के लिए बदलते राजनीतिक माहौल में राष्ट्रवादी और गैर राष्ट्रवादी सोच भी बड़ी समस्या है।  इस तरह के आरोप आए दिन पत्रकारों पर लगते रहते है। देश में युवाओं को भविष्य का संचालक कहा जाता है, जिसके बाद युवा पत्रकारों की जिम्मेदारी बन जाती है कि वो अपने क्षेत्र की पुरानी चमक को वापिस लेकर आए। गौरतलब ये भी है कि मीडिया में आजकल बॉयस्ड होने का आरोप भी लगता रहा है जिसके कारण ख़बरों की वास्तविकता पर चोट पहुंची है  और समाजिक विश्वास हिल जाता है। दरअसल अब समय की मांग है कि पत्रकारों की बिरादरी को आगे आना होगा जो आधुनिकता के साथ पत्रकारिता के मूल्यों को नष्ट होने से बचाएं और सामाजिक विश्वास को कायम रखे।

राजनीति के बदलते आयाम

भारत देश को आजाद हुए लगभग 70 साल हो गए, लेकिन आज के दौर में भारत की राजनीति में गहरा बदलाव देखने को मिल रहा है। भारतीय राजनीति आज के दौर में अपने खास गणित को लेकर की जाती है। कुछ अपवादों और विचलनों को छोड़ दें, तो राजनीति लगातार जोड़-तोड़ के गणित पर चलती रही है। देश में हर 5 साल में होने वाले चुनाव हर बार सत्ता की कमान किसी ना किसी राजनीतिक पार्टी को सौंप देते है। हालांकि राजनीति की एक नयी सुबह भले दूर हो, लेकिन हर बार के चुनावी नतीजे इसकी उम्मीद जगा जाते है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली की सत्ता के गलियारों में देखा जा सकता है। कुछ समय पहले भारत की राजधानी के पटल पर आई आम आदमी पार्टी (आप) का विधानसभा चुनावों में जोरदार प्रदर्शन ने भारतीय राजनीति में कुछ नए आयाम स्थापित किए है। आम लोगों की राजनीति में पहुंच का यह उत्तम उदाहरण हो सकता है।

दिल्ली की राजनीति में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आप के प्रदर्शन को केवल कांग्रेस पार्टी के खिलाफ लहर के प्रमाण के तौर पर समझना गलत होगा। दरअसल, आम आदमी पार्टी ने सदियों से चली आ रही परंपरागत राजनीति की मान्यताओं, मूल्यों और सोच को सिर के बल उल्टा खड़ा कर दिया और यहां हम बात सिर्फ आप पार्टी की ही क्यों करें?  इसका एक उदाहरण साफ छवि वाले मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान भी हो सकते है जिनकी बदौलत भाजपा मध्यप्रदेश में तीन बार जीतने वाली पार्टी बनी। उन्हे भी राजनीतिक आयाम में आए बदलाव का अचूक उदाहरण माना जा सकता है।

सीएम शिवराज सिंह की इस सफलता को कमतर आकंना सही नहीं होगा। उनकी कोशिश सराहनीय है, क्योंकि उन्होंने अपने कार्य-कौशल के बलबूते देश के बीमारू राज्यों में शामिल प्रदेश को प्रगति की दौड में शामिल किया है। वहीं छतीसगढ़ मे सीएम रमन सिंह के नेतृत्व को कैसे भुलाया जा सकता है जिनकी सोच और काम करने की लगन ने आदिवासी राज्य को प्रगति के बहुमुखी पथ पर चलना ही नहीं दौडना भी सीखाया।

दरअसल आज के समय मे राजनीति चुनावी दौर के समय की भागदौड नहीं रही यह तो बारहमासी नौकरी जैसी प्रक्रिया हो गई है। वहीं दूसरी तरफ आम जनता धर्म, संस्कृति आदि मान्यताओं से ऊपर उठकर विकास के साथ चलना पंसद करते है। यहीं कारण है कि भाजपा शरीक पार्टी ने अपनी राजनीति सोच को बदल कर पूरे भारत को भगवा करने का सपना देख रहीं है। जिसमें कहीं हद तक कायम होने में सफल भी रहीं है।

A BRIEF ON CREATIVE MEDIA

INTRODUCTION

Creative media is a medium to develop an initial idea to the final output in a systematic approach.

Production-Stages In creative media

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Pre-production                                    Production                             Post Production

 

 

 

 

Pre-production

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 Idea                                                   Storyboard                                        Planning

Production

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Production stage refers to the shooting process in live motion picture and making process by using software or manually in the animation field.

 

 

Post-production

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Postproduction includes the number of processes like video editing, adding visual effects and special effects, sound design and editing and color grading.

 

 

Tips for starting a small business

People find it difficult to start a venture; however, it may not be as difficult as most of us we think. Planning, making key financial decisions and understanding the business legal activities are the ways through which we can start-up and excel in the business world.

Gyanarthi 1As it is said ‘Business is all about decision making’ and taking a right decision at the right time can only give you an edge. Great economist and Nobel laureate Mohammad Yunus have said that it is always better to have self-employment rather than going for a wage employment. Though, being an entrepreneur involves huge risk but it gives better rewards and a greater satisfaction with the work done.

Starting your business should be initiated with a right business plan. Think about the resources which you can access and write a plan.  A well-written plan will help you to map out how to start and run your business successfully. You may always go for counseling and free training services and can prepare that.

Next hurdle is arranging a finance which is the most difficult part for an entrepreneur. You may seek assistance by seeking a bank loan, venture capital and other grants for your business to get started.

‘Location’ is one of the important factors in business.  Keeping in mind the ‘location strategy’ for a business you can select a customer-friendly location and keep intact with other norms.

Furthermore, you need to register for state and local taxes and obtain a business license or a permit. Apart from this, you need to understand employer responsibilities and other business legal aspects as well.

A budding entrepreneur should be very careful while managing his expenses for the first two years. He may have to cut down his expenses as far as possible. It is advisable to be frugal for a new venture.